17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच जिस अस्थायी समझौते (एमओयू) ने कुछ समय के लिए तनाव कम होने की उम्मीद जगाई, वो अब गंभीर संकट में है.
अमेरिका का कहना है कि इस समझौते के बाद होर्मुज़ सबके लिए खुल गया है. जबकि ईरान का दावा है कि यह समझौता होर्मुज़ स्ट्रेट पर उसके अधिकार की स्वीकृति है. इसके बाद दोनों एक-दूसरे से जुड़ी जगहों पर हमले कर रहे हैं.
पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी ने कहा कि “एमओयू को दोनों देश अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर रहे हैं. ऐसे में लगता है कि यह ‘मेमोरेंडम ऑफ़ मिसअंडरस्टैंडिंग’ बन चुका है. ये समझौता ज्ञापन जल्दबाज़ी में हुआ जिससे ये नहीं टिक सका.”
पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ अशरफ़ ज़ैदी का दावा है कि ईरानी जनता का एक वर्ग समझौते से ख़ुश नहीं है और यही भावना ईरानी प्रशासन के हालिया रुख़ में दिखती है कि वे ट्रंप से बदला चाहते हैं.
पूर्व राजदूत सूरी मानते हैं कि ईरान अब अपने आक्रमक रुख़ के चलते अपने समर्थक देशों का सपोर्ट खो सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग होर्मुज़ में अधिकार जमाने से ऊर्जा क़ीमतें फिर से बढ़ गई हैं, जिसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.
उन्होंने कहा कि अमेरिका के लिए अब युद्ध का मुख्य लक्ष्य होर्मुज़ को खुलवाना हो गया है और घरेलू स्तर पर युद्ध को लेकर कम समर्थन मिलने के चलते ट्रंप प्रशासन फिर से वार्ता की मेज पर लौटेगा. साथ ही बोलीं कि ईरान ने भी जवाबी ताक़त दिखाने के साथ कूटनीतिक रास्ता खुले होने का संकेत दिया है.
