ज़िंदगी जीने के दो ही तरीक़े होते हैं. एक, जो हो रहा है उसे होने दो और सब कुछ बर्दाश्त करते जाओ. दूसरा, ज़िम्मेदारी उठाओ और उसे बदलने की कोशिश करो.” – रंग दे बसंती (2006)
प्रसून जोशी ने ‘रंग दे बसंती’ फ़िल्म के डायलॉग और गीत लिखे थे.
विद्यार्थी आंदोलनों में जब इस फ़िल्म के गीत फिर से लोकप्रिय हो रहे थे, उसी दौरान जोशी की अध्यक्षता वाले सेंसर बोर्ड पर सवाल उठे, क्योंकि ओटीटी पर रिलीज़ हुई सतलुज फ़िल्म को हटा दिया गया था.
2010 के दशक के फ़िल्मी सितारे इमरान ख़ान ने विद्यार्थियों का समर्थन किया. इसके बाद उन्हें इंस्टाग्राम पर लोगों का काफ़ी प्यार मिला.
फ़िल्मों में अक्सर ख़लनायक की भूमिकाएँ निभाने वाले प्रकाश राज के समर्थन में भी लोगों ने खुलकर अपनी भावनाएँ ज़ाहिर कीं. यह अपने आप में एक दिलचस्प विरोधाभास था.
कॉलेज परिसरों में गूंजते नारे, हाथों में तख़्तियाँ, मोमबत्तियाँ जलाते लोग और इन दृश्यों को क़ैद करता कैमरा. पिछले दो दशकों में भारतीय सार्वजनिक जीवन में यह तस्वीर कई बार दिखाई दी है.
फ़िल्म और आंदोलन का रिश्ता
हर फ़िल्म, आंदोलन की अपनी अलग व्याख्या पेश करती है.
इन अलग-अलग व्याख्याओं के बीच मौजूद विरोधाभासों को समझने पर ही आंदोलन और सिनेमा के रिश्ते की असली जटिलता सामने आती है.
इस समय देश के कई हिस्सों में विद्यार्थी सड़कों पर उतरते दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में इस रिश्ते को एक बार फिर समझने की ज़रूरत महसूस होती है.
इन व्याख्याओं के बीच सबसे बुनियादी फ़र्क़ यह है कि आंदोलन को किस रूप में देखा जाता है. क्या आंदोलन नैतिक चेतना से पैदा होने वाली एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है?
या फिर वह एक सुनियोजित और संगठित राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है?
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फ़िल्म रंग दे बसंती (2006) में भगत सिंह और उनके साथियों की कहानी एक डॉक्यूमेंट्री के ज़रिए आज के युवाओं के सामने आती है.
धीरे-धीरे अतीत और वर्तमान के बीच की दूरी मिटने लगती है. एक दोस्त की मौत के बाद ये युवा एक भ्रष्ट रक्षा मंत्री की हत्या कर देते हैं.
यह कहानी निजी दुख और क्षति से पैदा हुए अचानक फूट पड़े ग़ुस्से की है. यह किसी संगठित राजनीतिक विचारधारा या लंबी राजनीतिक प्रक्रिया का नतीजा नहीं है.
