सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेल दुर्घटना में मृत या घायल यात्री के पास टिकट न मिलना मात्र मुआवजा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। यदि साक्ष्य यह साबित करते हैं कि पीड़ित वास्तविक यात्री था और दुर्घटना यात्रा के दौरान हुई, तो रेलवे यात्री को मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकता।
नई दिल्ली: कई बार रेल दुर्घटनाओं के होनो पर मुआवजे को लेकर अजीब स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे हादसों में जहां व्यक्ति को खुद का ख्याल नहीं रहता, टिकट का ख्याल कैसे रखे…और टिकट न होने पर रेलवे मुआवजे से इंकार करता आया है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि केवल टिकट का न मिलना मुआवजा अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है। न्यायालय ने माना कि रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि न्यायसंगत और मानवीय दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।
रेलवे अधिनियम की धारा 124 ए का उद्देश्यदुर्घटना पीड़ितों को शीघ्र राहत देना है। यह कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है, जहां संदेह से परे प्रमाण आवश्यक हो। रिकॉर्ड में उपलब्ध अन्य साक्ष्य मृतक की यात्रा और दुर्घटना की पुष्टि करते हैं। इसलिए केवल टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजा अस्वीकार करना उचित नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट और रेलवे ट्रिब्यूनल का फैसला
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने की।
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना के बाद टिकट खो जाना या बरामद न होना असामान्य नहीं है। ऐसे मामलों में केवल टिकट की अनुपस्थिति के आधार पर दावा खारिज करना कानून की भावना के विपरीत होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124 ए का उद्देश्य दुर्घटना पीड़ितों को शीघ्र राहत देना है। यह कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है, जहां संदेह से परे प्रमाण आवश्यक हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस रिकॉर्ड, रेलवे जांच रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज यह दर्शाते हैं कि मृतक या घायल ट्रेन का वास्तविक यात्री था, तो उसे मुआवजे का अधिकार मिलेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे दावा अधिकरण RCT को प्रत्येक मामले के तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए। तकनीकी कमियों के आधार पर पीड़ित परिवार को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध अन्य साक्ष्य मृतक की यात्रा और दुर्घटना की पुष्टि करते हैं। इसलिए केवल टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजा अस्वीकार करना उचित नहीं था।
और फिर अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी उदार और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की जानी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने पीड़िता को आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।